तुम्हारे दर पर अशरफ
फैज का दरिया उबलता है
तुम्हारा नाम लेने से सुकून इस दिल को मिलता है
कोई कैसा भी हो अशरफ
तुम्हारे दर पर पलता है
और जो तुम चाहो तो वह भी वली बनकर निकलता है
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जब अशरफ का दर मिला मुझे तकदीर ही मेरी बदल गई
जिस वक्त कर्म की पड़ी नजर तूफान से कश्ती निकल गई
मखदूम अशरफ का करम है
जब अशरफ का दर मिला मुझे तकदीर ही मेरी बदल गई
जिस वक्त कर्म की पड़ी नजर तूफान से कश्ती निकल गई
मखदूम अशरफ का करम है
मुझे इश्क हकीकी अता किया
कतरे से दरिया बना दिया
मुझे इश्क हकीकी अता किया कतरे से दरिया बना दिया
बलीहारी में अपने अशरफ के
मुझे ला इलाहा से मिला दिया
मखदूम अशरफ का करम है ये
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